‘दो घड़ी हम साथ बैठे मुस्कराने के लिए’
कुमकुम बैंक्वेट एवं फार्म हाउस, गोविंदपुरम में सुरेन्द्र कुमार श्रोत्री के सम्मान में हुआ अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन

गाजियाबाद: कुमकुम बैंक्वेट एवं फार्म हाउस, गोविंदपुरम में सुरेन्द्र कुमार श्रोत्री के सेवानिवृत्ति अभिनंदन समारोह के अवसर पर एक भव्य अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। देश के विभिन्न राज्यों से पधारे ख्यातिलब्ध कवियों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से श्रोताओं को देर रात तक मंत्रमुग्ध रखा। कार्यक्रम का सफल संचालन एवं संयोजन कवयित्री एवं प्रवक्ता डॉ. निवेदिता शर्मा ने किया।

हापुड़ से पधारे प्रख्यात ओज कवि डॉ. अनिल बाजपेई ने प्रकृति और प्रेम के अनुपम सौंदर्य को स्वर देते हुए कहा—
“धरती माँ ने प्रेम से, भेजी नभ फ़रियाद।
जलधर ने आकर किया, वसुधा से संवाद॥
पपिहा बोले प्रेम से, ‘पियू-पियू’ हर बार।
बूँद-बूँद में ढूँढ़ता, अपने प्रिय का प्यार॥”
एटा से आए आर्य राजेश यादव ने सामाजिक समरसता का संदेश देते हुए कहा—
“छोड़ दो ये जातिवाद, छोड़ दो भेदभाव,
यही इस देश के पतन के थे कारण।
करो आपसी समस्याओं का शीघ्र ही निवारण,
रोक रहे राष्ट्र के विकास को अकारण।”
गाजियाबाद की प्रख्यात कवयित्री डॉ. निवेदिता शर्मा ने श्रृंगार रस से सराबोर अपनी ग़ज़ल प्रस्तुत करते हुए कहा—
“कभी इकरार की बातें, कभी इंकार की बातें,
नैनों ने नैनों से की मनुहार की बातें।
मोहब्बत करने वालों के अलग संवाद होते हैं,
भरी महफ़िल में कर लेते हैं वो प्यार की बातें।”
दिल्ली से आए डॉ. शैल भदावरी ने सनातन संस्कृति पर हो रहे प्रहारों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा—
“श्रद्धा के सागर को तिल-तिल पाट रहे हैं,
दीमक बनकर जड़ें निरंतर चाट रहे हैं।
वृक्ष सनातन का कब तक खुद पनपेगा यूँ,
साख-साख जब सारे हर दिन काट रहे हैं।”
मेरठ से आए डॉ. सुदेश यादव ‘ज़ख्मी’ ने प्रेम की मधुर अभिव्यक्ति प्रस्तुत की—
“तू मेरी ज़िंदगी रब की सौगात है,
तू ही सुबह मेरी, तू मेरी रात है।
यूँ तो देखे हसीं हमने लाखों मगर,
जो किसी में नहीं, तुझ में वो बात है।”
देहरादून की कवयित्री कविता बिष्ट ने अपनी ग़ज़ल से खूब वाहवाही लूटी—
” दो घड़ी हम साथ बैठे मुस्कराने के लिए,
आ गई इल्ज़ाम दुनिया क्यों लगाने के लिए।
आपकी आँखें हैं मेरी ख़्वाबगाहें आजकल,
और पलकें शामियाना सर छुपाने के लिए।”
मैनपुरी से आए कवि मनोज चौहान ने राष्ट्रभक्ति का स्वर बुलंद करते हुए कहा—
“न अफ़ज़ल, मीरबाकी और न जयचंद को पूजें,
करे जो धर्मरक्षा, उन विवेकानंद को पूजें।”
परीक्षितगढ़ से आए वीरेन्द्र अबोध ने जीवन की विडंबना को स्वर देते हुए कहा—
“बदल गए जो लोग पता नहीं कैसे थे,
हम नहीं बदले, हम पहले जैसे थे।
मेरी मौत पे था तमाम गाँव में मातम,
वे दोस्त खुश थे जिन पर मेरे पैसे थे।”
हास्य कवि निर्मल सक्सैना ने अपनी चुटीली प्रस्तुति से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया—
“हम तेरे शहर में आए हैं बहारों की तरह,
देंगे खुशबू तो चुभेंगे कभी खारों की तरह।
आज चमके हैं तेरे नील गगन में जमकर,
डूब जाएंगे सुबह भोर के तारों की तरह।”
गाजियाबाद के देवेन्द्र देव जी का अंदाज कुछ अलग ही रहा उन्होंने सुनाया
‘देव’ आंखों ने मेरी कुछ ऐसे भी लम्हें देखें हैं,
जहां जज़ भी मैं था और सजा भी मैंने पाई।
दिल्ली से पधारे कवि रोहित रोज के शानदार संचालन ने कार्यक्रम को ऊंचाइयाँ प्रदान की।
कार्यक्रम में सुरेन्द्र कुमार श्रोत्री जी के सहकर्मियों और परिवार के सदस्यों ने पगड़ी,पटका और मालाओं से सम्मान किया।
कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने सभी कवियों का जोरदार तालियों से स्वागत किया। सुरेन्द्र कुमार श्रोत्री के सम्मान में आयोजित यह समारोह यादगार रहा। कार्यक्रम में बलदेव भाई, डॉ. वीणा मित्तल, अभय कुमार मिश्रा, राम आसरे गोयल, नवीन कुमार अरूण गोयल, शोभा गुप्ता, अंजलि आनंद, रवेन्द्र कुमार शर्मा, प्रमोद कुमार श्रोत्रिय आदि उपस्थित रहे।



