उत्तराखंड भाजपा में बढ़ता गढ़वाल का दबदबा! सरकार से संगठन तक मजबूत पकड़, पौड़ी बना पावर सेंटर
धामी सरकार की कैबिनेट में 10 मे से 8 मंत्री गढ़वाल से आते हैं, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष भी गढ़वाल मंडल से ही हैं
देहरादून: उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर गढ़वाल बनाम कुमाऊं का राजनीतिक संतुलन चर्चा के केंद्र में है। राज्य की सत्ता से लेकर भाजपा संगठन और अब केंद्रीय संगठन में सामने आ रही नई जिम्मेदारियों तक नजर डालें तो गढ़वाल की मौजूदगी लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। खास तौर पर पौड़ी गढ़वाल की राजनीतिक हैसियत पिछले कुछ समय में जिस तरह बढ़ी है उसने उत्तराखंड भाजपा के भीतर सत्ता और संगठन के समीकरणों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।

सरकार में गढ़वाल क्षेत्र के कई प्रमुख चेहरे महत्वपूर्ण विभागों और जिम्मेदारियों के साथ मौजूद हैं, वहीं प्रदेश संगठन में भी पौड़ी से आने वाले नेताओं की भूमिका अहम होती जा रही है। अब केंद्रीय संगठन की टीम में उत्तराखंड से जिन चेहरों को जगह मिली है उनमें भी गढ़वाल और विशेष रूप से पौड़ी से जुड़े नेताओं की मौजूदगी इस राजनीतिक तस्वीर को और स्पष्ट करती है।
सरकार में गढ़वाल का मजबूत प्रतिनिधित्व: उत्तराखंड की मौजूदा भाजपा सरकार के मंत्रिमंडल पर नजर डालें तो गढ़वाल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व काफी प्रभावशाली दिखाई देता है। 10 मे से 8 मंत्री गढ़वाल से ही हैं। इसमें सतपाल महाराज, गणेश जोशी, धन सिंह रावत, सुबोध उनियाल, मदन कौशिक, भारत चौधरी और प्रदीप बत्रा जैसे प्रमुख बीजेपी नेता सरकार में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। इनमें कई चेहरे लंबे समय से उत्तराखंड बीजेपी की राजनीति के बड़े स्तंभ माने जाते हैं। यही वजह है कि सरकार के राजनीतिक और क्षेत्रीय संतुलन पर चर्चा होती है तो गढ़वाल की हिस्सेदारी को नजरअंदाज करना मुश्किल है। हालांकि, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कुमाऊं से आते हैं। कुमाऊं क्षेत्र से रेखा आर्य और राम सिंह कैड़ा जैसे नेताओं की भी सरकार में अहम मौजूदगी है। मंत्रिमंडल के व्यापक राजनीतिक प्रभाव को देखें तो गढ़वाल के नेताओं की संख्या और उनका संगठनात्मक अनुभव इसे खासा वजन देता है।
सरकार के बाद संगठन में भी गढ़वाल की धमक: अब तस्वीर सिर्फ सरकार तक सीमित नहीं है भाजपा के केंद्रीय संगठन में नितिन नवीन की घोषित टीम में उत्तराखंड से तीन नेताओं को जिम्मेदारी मिलना राज्य की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व सांसद तीरथ सिंह रावत, राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी और आलोक भट्ट तीनों का संबंध पौड़ी गढ़वाल से है। यह संयोग मात्र है या उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल खासकर पौड़ी को मिल रही प्राथमिकता का संकेत इस पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा स्वाभाविक है।
वरिष्ट राजनीतिक जानकार जय सिंह रावत ने इसे लेकर कहा-
ये धामी विरोधियों की वजह से भी है। वो लगातार इस बात का प्रचार करते हैं कि गढ़वाल की उपेक्षा हो रही है, इसी वजह से शायद गढ़वाल में एंटी इनकंबेंसी है। संगठन को मालूम है कि गढ़वाल में चुके तो फिर कोई नहीं बचा सकता है, जिसके कारण गढ़वाल पर अधिक फोकस है. केंद्रीय संगठन में जगह मिलना केवल व्यक्तिगत राजनीतिक कद का संकेत नहीं होता बल्कि कई बार यह पार्टी के भीतर किसी क्षेत्र की राजनीतिक उपयोगिता और वहां के नेताओं पर केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे को भी दर्शाता है अब ये बीजेपी है यहा दिखता कुछ है ओर होता कुछ है।
पौड़ी लोकसभा सीट बीजेपी की पावर सेंटर: उत्तराखंड बीजेपी के मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में सबसे दिलचस्प पहलू पौड़ी लोकसभा क्षेत्र की मजबूत होती पकड़ है। एक तरफ केंद्र में संगठन की नई टीम में पौड़ी से जुड़े तीन चेहरे दिखाई दे रहे हैं तो दूसरी तरफ राज्य सरकार में भी पौड़ी लोकसभा क्षेत्र से आने वाले कई प्रभावशाली नेता मौजूद हैं। सतपाल महाराज और धन सिंह रावत जैसे बड़े राजनीतिक चेहरे इसी लोकसभा क्षेत्र से आते हैं। भारत चौधरी भी इसी क्षेत्र की राजनीति में महत्वपूर्ण नाम है। इतना ही नहीं बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट भी पौड़ी लोकसभा क्षेत्र से आते हैं। यानी सरकार प्रदेश संगठन और केंद्रीय संगठन तीनों स्तरों पर पौड़ी से जुड़े चेहरों की मौजूदगी को एक साथ रखकर देखें तो यह क्षेत्र बीजेपी की राजनीतिक रणनीति में खास महत्व रखता हुआ नजर आता है।
राज्यसभा सांसद भी गढ़वाल से: गढ़वाल के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव की दोनों राज्यसभा सांसद के तौर पर भी दिखाती है। गढ़वाल से आने वाले नरेश बंसल, महेंद्र भट्ट राज्यसभा में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। राज्यसभा में भी गढ़वाल की मौजूदगी मजबूत है। इसे यदि प्रदेश संगठन राज्य सरकार और केंद्रीय बीजेपी की जिम्मेदारियों के साथ जोड़कर देखा जाए तो गढ़वाल के नेताओं का राजनीतिक नेटवर्क कई स्तरों पर दिखाई देता है। यही वजह है कि भाजपा के मौजूदा सत्ता-संगठन समीकरणों में गढ़वाल की भूमिका को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों की दिलचस्पी बढ़ना स्वाभाविक है।
कुमाऊं की हिस्सेदारी भी कम नहीं: हालांकि, इस पूरी तस्वीर को सिर्फ गढ़वाल के दबदबे के रूप में देखना भी अधूरा होगा। उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं की हिस्सेदारी भी बेहद महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी स्वयं कुमाऊं से आते हैं। सरकार में रेखा आर्य तथा राम सिंह कैड़ा जैसे नेताओं की भी मौजूदगी है। भाजपा के लिए उत्तराखंड की राजनीति में दोनों मंडलों के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। राज्य की भौगोलिक और राजनीतिक संरचना ऐसी है कि किसी भी पार्टी के लिए गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों को साधना जरूरी है। इसलिए गढ़वाल की बढ़ती राजनीतिक मौजूदगी के साथ यह भी देखना होगा कि आने वाले समय में बीजेपी कुमाऊं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को किस तरह संतुलित करती है।
2027 से पहले तैयार हो रहा है नया राजनीतिक समीकरण?: विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ने के साथ यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि बीजेपी अपने क्षेत्रीय समीकरणों को किस तरह साधेगी? लगातार दो बार सत्ता में वापसी कर चुकी भाजपा के सामने तीसरी बार सत्ता हासिल करने की चुनौती होगी। ऐसे में पार्टी के लिए गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों का संतुलन निर्णायक रहेगा। गढ़वाल में मजबूत संगठनात्मक ढांचा और प्रभावशाली नेताओं की मौजूदगी पार्टी को फायदा दे सकती है, लेकिन साथ ही कुमाऊं में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक स्वीकार्यता को भी भाजपा अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहेगी।
दिल्ली के घटनाक्रम के पीछे की वजह: कुल मिलाकर उत्तराखंड भाजपा की मौजूदा तस्वीर को अगर एक फ्रेम में रखा जाए तो सरकार में गढ़वाल की मजबूत मौजूदगी, प्रदेश संगठन में पौड़ी से नेतृत्व, राज्यसभा में गढ़वाल के प्रतिनिधि और केंद्रीय संगठन में पौड़ी से जुड़े चेहरों की मौजूदगी एक खास राजनीतिक पैटर्न की ओर इशारा करती है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा की पूरी रणनीति गढ़वाल केंद्रित हो गई है। कुमाऊं को भी पार्टी लगातार राजनीतिक महत्व देती रही है। इतना जरूर है कि उत्तराखंड बीजेपी में गढ़वाल और उसके भीतर खास तौर पर पौड़ी गढ़वाल इस समय राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली स्थिति में दिखाई दे रहा है। सवाल अब यही है कि आने वाले विधानसभा चुनाव और संगठन के अगले विस्तार में यह प्रभाव और बढ़ेगा या बीजेपी क्षेत्रीय संतुलन को साधने के लिए कुमाऊं को भी उतना ही बड़ा राजनीतिक स्पेस देगी ?



