तस्मिया एकेडमी में सजी मोहब्बत और भाईचारे की महफ़िल
“एक शाम भाईचारे के नाम” कवि सम्मेलन व मुशायरा आयोजित

देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित तस्मिया एकेडमी, 1 इंदर रोड में एनएपीएसआर, बल्ड फ्रैंड्स और इंसाफ़ की दस्तक की जानिब से रविवार को “एक शाम भाईचारे के नाम” शीर्षक से कवि सम्मेलन एवं मुशायरा आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. एस. फारुख़, अध्यक्ष हिमालय वेलनेस देहरादून ने की। मुशायरे में मुख्य अतिथि के रूप में समाजसेवी धनंजय उपाध्याय तथा पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के ओएसडी सय्यद मोहम्मद कासिम की गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में डाॅ आर के बख़्शी व के जी बहल उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में प्रेम, सौहार्द और आपसी एकता का संदेश देना था। शायरी और कविता की इस महफ़िल में शहर के प्रतिष्ठित रचनाकारों ने अपने-अपने अंदाज़ में मोहब्बत, इंसानियत और सामाजिक सरोकारों की बात कही।
मुशायरे का आगाज़ डॉ एस फारुख़, धनंजय उपाध्याय, सैय्यद मोहम्मद कासिम, केजी बहल, अंबिका सिंह रूही, मोहम्मद शाह नज़र, मोनिका मंतशा व आरिफ़ ख़ान ने शमा रोशन कर किया।
भाईचारे और एकता का संदेश
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. एस. फारुख़ ने कहा कि हम सब एक ही मां-बाप की औलाद हैं और देश के विकास के लिए मिल-जुलकर कार्य करना समय की आवश्यकता है। मुख्य अतिथि धनंजय उपाध्याय ने कहा कि आज के व्यक्तिवाद के दौर में भाईचारे की बात करना भी मानो अपराध समझा जाने लगा है, लेकिन आज जो भाईचारे की शमा रोशन हुई है, उससे देश में एकता का उजियारा अवश्य फैलेगा।
केजी बहल ने अपने विचार रखते हुए कहा कि समाज से नफ़रत मिटाने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
सैय्यद मोहम्मद कासिम ने कहा कि वर्तमान समय में इस प्रकार की महफ़िलें बेहद आवश्यक हैं, क्योंकि यही आयोजन समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं।

शायरों ने बांधा समां
मुशायरे में शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
असलम खतौलवी ने पढ़ा—
“शजर को काट के पौधे नए बोने की ज़िद है,
अजब इंसान है, जिसको ख़ुदा होने की ज़िद है।”
बदरुद्दीन ज़िया, देहरादून ने कहा—
“ख़ुश रहा शुक्र-ए-ख़ुदा कर लिया,
मुझको जो कुछ मिला इक्तिफ़ा कर लिया।”
अंबर खरबंदा, देहरादून ने भावपूर्ण अंदाज़ में पढ़ा— “दर्द के गहरे समुंदर में उतर जाता, तो
मैं अगर तल्ख़ी-ए-हालात से डर जाता, तो
ये मेरे फूल से बच्चे भी तो कुम्हला जाते
मैं जो दिन भर की थकान ओढ़ के घर जाता, तो।”
शादाब मशहदी ने शानदार संचालन का दायित्व निभाया, और अपने बेहतरीन कलाम से ख़ूब वाह वाही लूटी।
अंबिका सिंह रूही, देहरादून ने पढ़ा—
“रहगुज़र की तपती रेत सा आतिश-ज़दा हर पल,
तुम हो मुहब्बत का शहर, तुम साथ आ जाओ।”
शाख़ दूनवी, देहरादून ने कहा—“जब उनकी जुल्फ़ों को सरे-दीवार जमाल आया था,
तब उन्हें हुस्न को ढकने का ख़्याल आया था।”
रईस अहमद “फ़िगार”, देहरादून ने पढ़ा—
“आंख में जो पानी है, दर्द की निशानी है,
आंख की चमक लेकिन सच की पासबानी है।”
“शौहर” जलालाबादी, देहरादून ने व्यंग्य शायरी से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया।
ए. एम. इम्तियाज़ कुरैशी, देहरादून ने कहा—
“मेरा उस्ताद कोई एक नहीं,
सारी दुनिया सिखा रही है मुझे।”
सुनील साहिल, देहरादून ने पढ़ा—
“हम अपनी जिंदगी से ख़ुश-बयानी खो चुके हैं,
दुआओं से मुअत्तर ज़िंदगानी खो चुके हैं।”
दर्द गढ़वाली, देहरादून ने कहा—
“है विरासत में मिली मुझको मुहब्बत,
सो मुहब्बत ही मुहब्बत कर रहा हूं।”
कुमार विजय द्रोणी, देहरादून ने संदेश दिया—
“ज़माना बड़ा ख़राब है, ख़ुद को ज़रा संभाला करो,
अंधेरा दिलों में बहुत है, मुहब्बत का उजाला करो।”
धनंजय उपाध्याय, देहरादून ने पढ़ा
धर्म है मज़हब है वहशत है पर ये नारा
ज़ीस्त की सब ख़ला को मिटा दे भाईचारा
दीपक कुमार अरोड़ा, देहरादून ने कहा—
“जो अंधेरे से न समझौता करे,
एक ‘दीपक’ और यहां आबाद हो।”
मोनिका मंतशा, देहरादून ने पढ़ा—
“हमें जो बात कहनी हो अलल-ऐलान कहते हैं,
मुनाफ़िक़ की तरह अपनों की ग़ीबत हम नहीं करते।”
आयोजकों ने व्यक्त किया आभार
कार्यक्रम के आयोजन में एनएपीएसआर के आरिफ़ ख़ान, इंसाफ़ की दस्तक के मोहम्मद शाह नज़र तथा बल्ड फ्रैंड्स के सुमित गर्ग और मोनिका मंतशा की प्रमुख भूमिका रही। सभी अतिथियों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया गया।
इस अवसर पर एम. एम. मुस्तफ़ा, अफ़ज़ल ज़मीर बैग, इकराम अंसारी, डॉ. अनवर अहमद, अफ़साना सुल्तान, गिरीश पंत, कविता खान, तौसीफ़ खान, मौलाना अब्दुल वाजिद, सय्यद दानिश, डॉ. असगर अली, अमर सिंह, संजय कुमार, आनंद सिंह, नवल बहुगुणा, रजनी बहुगुणा, संगीता नौटियाल सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। यह आयोजन सचमुच भाईचारे, एकता और मोहब्बत के संदेश से ओतप्रोत एक यादगार शाम साबित हुआ।



