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एक व्यंग्य ‘चंदा पुरुष’

समस्या चंदा देने या लेने में नहीं है, समस्या उस मानसिकता में है जहाँ दूसरों की आस्था को सीढ़ी बनाकर अपनी सामाजिक हैसियत ऊँची की जाती है। आज चंदा पूजा के नाम पर है, कल किसी और बहाने से होगा

हमारे समाज में प्रजातियों का विकास अब केवल जीव-विज्ञान तक सीमित नहीं रहा। यहाँ नई-नई सामाजिक नस्लें भी पैदा हो रही हैं। इन्हीं में से एक है—चंदा-पुरुष। यह वह प्राणी है जो अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले जाना तो चाहता है, पर अपने पैसों से नहीं, बल्कि दूसरों की श्रद्धा, भावना और मजबूरी से निकले चंदे से।

इस महान उद्देश्य की शुरुआत होती है एक पवित्र घोषणा से—“फलाँ दिन पूजा है, प्रसाद वितरण होगा, माता-पिता की मनोकामना पूर्ति के लिए आयोजन रखा गया है।” घोषणा सुनते ही मोहल्ले की श्रद्धा जाग उठती है। कोई सौ देता है, कोई पाँच सौ, कोई हज़ार देकर स्वयं को पुण्य का भागीदार मान लेता है। चंदा-पुरुष सबके आगे हाथ जोड़कर इतना विनम्र हो जाता है कि लगता है मानो स्वयं प्रसाद बन गया हो।

लेकिन असली व्यंग्य तो आयोजन के दिन सामने आता है। जिन लोगों से चंदा लिया गया, वे ढूँढे नहीं मिलते। न उनके लिए बैठने की जगह, न प्रसाद की थाली। पूछने पर उत्तर मिलता है—“अरे, भीड़ बहुत थी, आप लोग तो अपने ही हैं।”
अपने ही लोग अक्सर सबसे पहले उपेक्षित होते हैं—यह सामाजिक सिद्धांत अब सिद्ध हो चुका है।

वहाँ उपस्थित होते हैं वे खास लोग, जिनके लिए चंदा इकट्ठा किया गया था—अफसरशाही, स्थानीय नेता, प्रभावशाली रिश्तेदार। पूजा कम, स्वागत-सत्कार अधिक होता है। फूलों की माला, शॉल, मिठाइयाँ और फोटो सेशन—सब कुछ भक्ति से भरपूर, बस ईश्वर को छोड़कर।

एक ओर चंदा देने वाले उपवास में बैठे होते हैं—“आज प्रसाद मिलेगा” की आस में, और दूसरी ओर चंदा-पुरुष के खास मेहमान विलासिता का पूर्ण आनंद ले रहे होते हैं। प्लेट में पाँच प्रकार की सब्ज़ी, तीन मिठाइयाँ और ऊपर से खीर—मानो पुण्य नहीं, बुफे चल रहा हो।

चंदा-पुरुष बड़े गर्व से कहता है—“सब माता-पिता के आशीर्वाद से हुआ है।”
माता-पिता सचमुच आशीर्वाद देते हैं, पर शायद मन ही मन सोचते भी होंगे कि तीर्थ यात्रा अगर इसी तरह होती है तो घर पर रहना ही बेहतर था।

इस पूरे आयोजन में धर्म, संस्कार और सेवा—तीनों को व्यवस्थित रूप से कोने में बैठा दिया जाता है। चंदा साधन बन जाता है, और उद्देश्य बन जाता है—पहुँच, पहचान और प्रभाव।

समस्या चंदा देने या लेने में नहीं है, समस्या उस मानसिकता में है जहाँ दूसरों की आस्था को सीढ़ी बनाकर अपनी सामाजिक हैसियत ऊँची की जाती है। आज चंदा पूजा के नाम पर है, कल किसी और बहाने से होगा

कुल मिलाकर, हमारे समाज में यह नया चंदा-पुरुष तेजी से फल-फूल रहा है—जो खुद उपवास का नाटक करता है, दूसरों को उपवास में रखता है, और अंत में खुद पूरा विलास कर लेता है।
और हम?

हम अगले आयोजन की घोषणा का इंतज़ार करते हैं—शायद इस बार प्रसाद मिल ही जाए।

 

– सुरजीत मान जलईया सिंह
असम

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