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‘दिन ढलते ही शाम घनी गुमनाम यहाॅं होती है’

- राष्ट्रीय कवि संगम की महिला इकाई की ओर से विधानसभा रोड स्थित गुफ्तगू बुक एंड काफी बार में हुआ काव्य समागम, कवियों ने कवि गोष्ठी में प्यार-मोहब्बत और देशभक्ति की रचनाओं से श्रोताओं की तालियां बटोरी

देहरादूनः राष्ट्रीय कवि संगम की महिला इकाई की ओर से शनिवार को विधानसभा रोड स्थित गुफ्तगू बुक एंड काफी बार में आयोजित काव्य गोष्ठी में कवियों ने जहां प्यार-मोहब्बत की रचनाएं सुनाई, वहीं देशभक्ति की रचनाओं से जोश भरा। कवि गोष्ठी की अध्यक्षता संस्था की अध्यक्ष मीरा नवेली ने की, जबकि संचालन धमेन्द्र उनियाल धर्मी ने किया।

काव्य गोष्ठी की शुरुआत नीरू गुप्ता मोहिनी ने सरस्वती वंदना से की। इसके बाद कविताओं का सिलसिला शुरू हुआ। मीरा नवेली ने मौजूदा हालात को भगवान श्री कृष्ण से जोड़ते हुए अपनी रचना ‘अब तक सुनाई थी बंसी कन्हाई, अब है सुदर्शन चक्र की बारी। सभी श्रोताओं का दिल जीत लिया। वरिष्ठ कवि जसवीर सिंह हलधर ने ‘घर के भेदी थे घटना में या थे सीमा पार से, लाल किले ने प्रश्न किया है भारत की सरकार से’ के साथ ही आतंकी की बू आती क्यों , मस्जिद की मीनार से, वही चमन को सींचा है अपने लहू से, बागबानों ने सवाल ये है के अब फूलों की हिफाजत कौन करे। एडवोकेट जावेद अहमद ने अपनी कविता पढ़कर सभी श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया कर दिया। गीतकार शिव मोहन सिंह की कविता ‘दिन ढलते ही शाम घनी गुमनाम यहाॅं होती है, आज कहाँ अभिराम किसी की शाम यहाॅं होती है’ को खूब सराहा गया।

श्रीकांत श्री ने अपनी कविता जिनके बलिदानों से स्वर्णिम यह भारत आज बताता हूं , एक अमर कहानी पन्ना की तुम सबको आज सुनाता हूँ। नीरू गुप्ता मोहिनी की कविता शक्ति-बुद्धि के सामने, ठहर सका है कौन। सद्बुद्धि कह रही यही, रखो अधर पर मौन सुनाकर खूब तालियां बटोरी। वरिष्ठ कवि और संचालक धर्मेन्द्र उनियाल धर्मी ने ‘मैं चल रहा हूँ लेकर बीन आजकल, साथ में पिटारे दो तीन आजकल। आस्तीन के सांपों से निपटने के लिए, मैंने चढ़ा रखी है आस्तीन आजकल’ सुनाकर सभी का दिल जीत लिया।

हरिद्वार से सुशील रावत ने पहली वार राष्ट्रीय कवि संगम मंच की गोष्ठी में पहली बार अपनी कविता ‘शहर की गलियों में गांव की धूल ढूंढ रहा हूं, काँटों की इस नगरी में मैं फूल ढूंढ रहा हूं, पढ़कर खूब वाहवाही लुटी। शिवशंकर कुशवाहा ने कहा ‘भरी महफिल में तू बहुत याद आती है मां। रोक नहीं पाता आंखें बरस जाती हैं मां’ से वाहवाही लूटी। इंटरनेशनल खिलाड़ी मोहम्मद कैफ ने ‘इस फरेबी दुनिया में दुनियादारी नहीं आती, झुठ को सच करना हमें नहीं आती’ पढ़कर तालियां बटोरी।

 

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