विद्युत संविदा कर्मियों ने शासनादेश की शर्तों का किया विरोध, कोर्ट की अवमानना का लगाया आरोप
उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार को “समान कार्य के लिए समान वेतन” सुनिश्चित करने का दिया था आदेश

देहरादून: उत्तराखंड विद्युत संविदा कर्मचारी संगठन (इंटक) ने उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के अनुपालन में “समान कार्य के लिए समान वेतन” सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दो अप्रैल को उत्तराखंड शासन के कार्मिक विभाग की ओर से जारी शासनादेश का कड़ा विरोध किया है। संगठन का कहना है कि शासनादेश में जो शर्तें रखी गई हैं, वह अनुचित हैं।
संगठन के प्रदेश अध्यक्ष विनोद कवि का कहना है कि संगठन का स्पष्ट मत है कि उक्त अनुबंध की शर्तें न्यायालयों के आदेशों की भावना एवं निर्देशों के विपरीत हैं। उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय एवं श्रम न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से समान कार्य समान वेतन के साथ-साथ नियमितीकरण के आदेश पारित कर चुका है, किन्तु शासन के कुछ अधिकारी इन आदेशों की अवहेलना करते हुए जानबूझकर न्यायालय की अवमानना कर रहे हैं। प्रस्तावित अनुबंध की शर्तें श्रम कानूनों, ईएसआई अधिनियम, ईपीएफ अधिनियम तथा बोनस अधिनियम का खुला उल्लंघन हैं। ये शर्तें संविदा कर्मचारियों को बंधुआ मजदूरी एवं बेगारी जैसी परिस्थितियों की ओर धकेलती हैं तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा के अधिकारों से वंचित करती हैं। इसलिए संगठन ऐसे कर्मचारी-विरोधी आदेशों को तत्काल निरस्त करने की मांग करता है। ऐसे शासनादेश अधिकारियों की संविदा कर्मचारियों विरोधी नकारात्मक सोच को भी उजागर करता है। संगठन इस विषय में शीघ्र ही विधिक परामर्श प्राप्त करेगा तथा आवश्यकता पड़ने पर सड़क पर आंदोलन करने से भी पीछे नहीं हटेगा।
विनोद कवि ने एक बयान में मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि न्यायालयों के आदेशों का सम्मान करते हुए दो अप्रैल को जारी शासनादेश को तत्काल निरस्त करने के निर्देश प्रदान करें। साथ ही, सरल एवं न्यायसंगत अनुबंध व्यवस्था के अंतर्गत राज्य के विभिन्न विभागों में उपनल के माध्यम कार्यरत समस्त संविदा कर्मचारियों को “समान कार्य के लिए समान वेतन” प्रदान करें तथा जिन उपनल कर्मचारियों द्वारा 10 वर्ष की निरंतर सेवा पूर्ण कर ली हो उन्हें विनियमितीकरण नियमावली-2025 के तहत नियमित किया जाए। साथ ही संगठन संविदा कर्मचारी विरोधी मानसिकता वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही की मांग करता है जिनके द्वारा जानबूझकर न्यायालय के आदेशों अवमानना की जा रही है तथा सरकार की छवि धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है।



