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बच्चों के लिए प्रेरणादायक है डॉ. बिपिन पांडेय की पुस्तक

"बालमन की कुण्डलियाँ" पुस्तक रिव्यू

आज के समय में हम बच्चों से अच्छे व्यवहार, अनुशासन और संस्कारों की अपेक्षा तो करते हैं, किंतु विडंबना यह है कि उस व्यवहार के निर्माण हेतु आवश्यक मार्गदर्शन देना अक्सर भूल जाते हैं। हम चाहते हैं कि बच्चे संवेदनशील, सहृदय और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण बनें, परंतु उन्हें वह साहित्य, वह वातावरण और वह स्नेहिल दिशा कम ही दे पाते हैं, जो इन गुणों को सहज रूप से विकसित कर सके। ऐसे दौर में, जब हर व्यक्ति अपनी पहचान के प्रचार-प्रसार में व्यस्त है, जब शोर अधिक है और आत्ममंथन कम, तब चूल्हे की धीमी आँच की तरह शांत, सतत और सृजनशील लेखन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी संदर्भ में डॉ. बिपिन पाण्डेय का बाल साहित्य विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने बालमन की कोमल भावनाओं को समझते हुए जिस संवेदनशीलता और सरलता से रचना की है, वह सराहनीय है। उनकी पुस्तक ‘बालमन की कुण्डलियाँ’ न केवल साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि बालकों के मानस पर अपनी छाप छोड़ने में भी सक्षम है। इस पुस्तक का आकर्षण केवल शब्दों तक सीमित नहीं है; प्रत्येक कुण्डली के साथ दिए गए चित्र बच्चों की कल्पना को पंख प्रदान करते हैं।
मेरी सात वर्षीया बेटी इस पुस्तक को बड़े चाव से पढ़ रही है। वह हर कुण्डली को पहले लय में पढ़ती है, फिर उसके नीचे बने चित्रों में अपनी कल्पनाओं के रंग भरती है। उसके लिए यह केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं, बल्कि सृजन का माध्यम बन गई है। वह शब्दों को समझने का प्रयास करती है, भावों को पकड़ती है और फिर उन्हें रंगों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। इस प्रकार यह पुस्तक पढ़ने, समझने और रचने—तीनों प्रक्रियाओं को एक साथ सक्रिय करती है।
कुण्डलियाँ छंद का एक विशिष्ट रूप हैं। पाण्डेय जी द्वारा बच्चों के लिए छंदबद्ध साहित्य की रचना न केवल परंपरा से जुड़ाव बनाए रखती है, बल्कि बच्चों में लय, ध्वनि और शब्द-संवेदना के प्रति रुचि भी उत्पन्न करती है। संभव है कि वे तत्काल छंद के नियमों को न समझें, किंतु लयात्मकता के माध्यम से सीखने की उनकी क्षमता अवश्य विकसित होती है। यह सर्वविदित है कि बच्चे गद्य की अपेक्षा पद्य को अधिक शीघ्र ग्रहण करते हैं, क्योंकि उसमें संगीतात्मकता और स्मरणीयता दोनों निहित होती हैं।
यही कारण था कि हमारी माँ और नानी ने हमें बाल्यकाल से ही लोरियाँ सुनाईं। वे लोरियाँ केवल नींद का माध्यम नहीं थीं, बल्कि भाषा, लय और संस्कार का प्रथम पाठ भी थीं। लोरी की धुन में ही प्रेम, सुरक्षा और अपनत्व का भाव समाहित होता था। आज आवश्यकता है कि हम उस परंपरा को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करें।
डॉ. बिपिन पाण्डेय की यह कृति उसी दिशा में एक सार्थक प्रयास है। यह पुस्तक बच्चों को केवल मनोरंजन ही नहीं करती, बल्कि उन्हें संवेदनशील, कल्पनाशील और सीखने के प्रति उत्सुक बनाती है। ऐसे साहित्य की आज के समय में अत्यंत आवश्यकता है, जो शोर के बीच शांति, और भागदौड़ के बीच ठहराव का मूल्य सिखा सके।

समीक्षक: सुरजीत मान जलईया सिंह
दुलियाजान, असम

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