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लुप्त होती भाषाओं को बचाना ही अपनी पहचान बचाना है

21 फरवरी : अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

डॉ. अतुल शर्मा

देहरादून: भाषाए संस्कृति और साहित्य
की जीवित पहचान होती हैं, वह सिर्फ संवाद के लिए ही नहीं होतीं। आचार व्यवहार वर्तमान और भविष्य मे सकारात्मक उपस्थित भी होती हैं। भाषायें ‘ पहचान ” होती हैं। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को दुनिया भर मे मनाया जाता है।

दुनिया मे सबसे ज्यादा बोली जाने वाली 20 भाषाओं मे 6 भारतीय भाषाए है। जिनमे तीसरे स्थान पर हिन्दी है। 61_5 करोड़ लोग हिन्दी बोली जाती है दुनिया भर मे। भाषाए तेजी से विलुप्त हो रही हैं। 1991 की जनगणना के आनुसार भारत मे 1-652 भाषाए थीं। 1971 मे घटकर 808 रह गयीं। 2013 के लोकभाषा सर्वेक्षण के अनुसार 50 वर्षों मे 220 भाषाए लुप्त हो गयी। वहीं 197 लुप्त होने के कगार पर हैं।
युनेस्को ने अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का फैसला किया था।

बोलियों से बनती हुई भाषाओं का अस्तित्व अब कैसा है इसके विषय मे चर्चा ज़रुरी है।
बोलियों मे ध्वनियात्मक शब्दों का समृद्ध संसार होता है।
गढ़वाली भाषा बहुत समृद्ध है। कुमाउँनी और जौनसारी व रंवालटी , के साथ बंगाण की बोली भाषा भी। इसका साहित्य उपलब्ध है।
बोली भाषा को संरक्षित किया जा रहा है। और भी प्रयास ज़रुरी है। ऐसा दुनिया भर मे है।

हिन्दी भाषा मे अनेक भाषाओं के शब्द हैं। उर्दू अंग्रेजी अरबी फारसी आदि।
इसी तरह ओक्सफोर्ड मे क ई हिन्दी के शब्द शामिल किये गये हैं। भाषाओं का संरक्षण ज़रुरी है। यह स्थानीयता, आत्मियता और संस्कारो का जीवित संसार है।

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