विद्रोही तेवर का शायर अखिलराज इंदौरी
अच्छी सोच, अच्छे ख्याल और बेबाकी से अपनी बात रखना आसान नहीं है। मौजूदा दौर तो ऐसा दौर है, जिसमें सच कहना-लिखना दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। ग़लत को ग़लत कहने में भी लोग हिचकिचा रहे हैं। ऐसे दौर में भी इंदौर की सरजमीं पर एक शायर है अखिलराज इंदौरी, जो सच को सच और ग़लत को ग़लत कहने का माद्दा रखता है। अखिलराज का ग़ज़ल संग्रह मैंने अमेजन से मंगाया। अखिलराज का ग़ज़ल संग्रह ‘लावा’ मैंने कई बार पढ़ा और जितना समझ पाया, वह इस तबशिरे की शक्ल में आपके सामने रख रहा हूं।

भ्रष्टाचार की दीमक किस तरह सिस्टम पर लगी हुई है, इसे अखिलराज ने यूं बयां किया है।
सारा सिस्टम सड़ा हुआ है, मुल्क खड़ा है दलदल में।
अफसर नेता बिक जाते हैं पैसा औरत बोतल में।।
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मां की बूढ़ी आंखें इनको चुनते-चुनते हार गई।
कंकर इतने मिले हुए हैं इस सरकारी चावल में।।
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अखिलराज के तमाम शे’र हालाते-हाजरा से वाबस्ता है। देश में घट रहे तमाम घटनाक्रमों को उन्होंने अपनी ग़ज़लों का विषय बनाया है। सियासत से जुड़ा एक शे’र देखिएः
वो जब चाहे हंसाता है वो जब चाहे रुलाता है।
महारत है उसे हर किस्म का किरदार करने में।।
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अखिलराज का हर शेर कुछ न कुछ बोलते हुए चलता है। उनकी शायरी में आम आदमी का दर्द बड़ी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। ये शे’र देखिएः
अमीरे-शहर हिका़रत से देख मत इनको।
गरीब बच्चे कोई पाप के नहीं होते।।
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मौजूदा समाज में किस तरह रिश्ते अपना भरोसा खो रहे हैं, इसे अखिलराज ने अपनी शायरी में इस तरह कहा हैः
अगर मामा की नीयत का जरा भी इल्म हो जाता।
तो उसके साथ हरगिज शहर बेचारी नहीं जाती।।
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सरकार की कल्याणकारी नीतियों के दावों की भी उन्होंने अपनी शायरी में कलई खोली है। कुछ शे’र देखिएः
पूरा बकरा तो नहीं कुछ बोटियां मिल जाएंगी।
हक जो मांगा तो हक की चिंदिया मिल जाएंगी।।
मुल्क के मासूम लोगों फिर इलेक्शन आएगा।
फिर से वादों की तुमको टाफियां मिल जाएंगी।।
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ये सरकारी सहूलत किस तरह से पहुंचे बतलाओ।
के अपने गांव तो मोटर भी सरकारी नहीं जाती।।
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सत्ता पक्ष नीतियों का विरोध करने वाले विपक्षी नेताओं को किस तरह डरा और धमका रहा है, वह भी अखिलराज की आंखों से बच नहीं पाया और इस तरह शायरी में ढल गया। तीन शे’र देखिएः
अजब ये दौर है कातिल के हाथों से जो बच निकले।
तो चुन-चुन कर इन्हें इंसाफगाहें मार डालेंगी।।
मसीहा! गर तेरी सच्चाई बतला दूं उन्हें जाकर।
तो कब्रों से निकलकर तुझको लाशें मार डालेंगी।।
इसी डर से तो ‘साहब’ से बगावत कर नहीं सकते।
वो फाइल खोल देंगे और जांचें मार डालेंगी।।
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सच कहूं तो अखिलराज ने सत्ता के सामने झुकने के बजाय कलम के माध्यम से दो-दो हाथ करना जरूरी समझा, जो एक कवि और शायर की जिम्मेदारी भी है और उनके तमाम शेरों में विद्रोही तेवर देखे जा सकते हैं। ये शे’र देखिएः
देखते ही देखते ये मोजजा़ भी हो गया।
कल तलक जो था शराबी वो नमाजी हो गया।।
खानकाहों में फरिश्ते तो अलग बैठे रहे।
और इक बदनाम गुंडा शहर-काजी हो गया।।
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अखिलराज ने ग़ज़ल की नजा़कत और नफासत को भी समझा और उस पर भी अपनी कलम चलाईः
वो दिखलाते हमें जलवे तो पागल हो गए होते।
उठा देते अगर पर्दे, तो पागल हो गए होते।।
बताएं क्या तुम्हारी याद ने कितना सताया था।
अगर कल शब नहीं रोते, तो पागल हो गए होते।।
हमारे दिल पर तो बस उनके ग़म की हुक्मरानी थी।
अगर हम शे’र ना कहते, तो पागल हो गए होते।।
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सच कहूं तो कहन के मामले में अखिलराज की शायरी दुष्यंत कुमार और अदम गौंडवी जैसे शायरों से कमतर नहीं है। आखिर में कुछ शे’र देखिएः
धरती ने अपने जिस्म से चिपका रखा उसे।
सर्दी से कांपता रहा सूरज तमाम रात।।
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हमारे अहद के लड़कों को बर्बादी सिखाते हैं।
अदब के नाम पर कुछ लोग शैतानी सिखाते हैं।।
सिखाओ किस तरह हक़ अपना बढ़ के छीना जाता है।
मगर इक आप हैं जो राग दरबारी सिखाते हैं।।
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वो उन मासूम जे़हनों पर इबारत लिखता रहता है।
मुहब्बत उनको बतलाता है, नफरत लिखता रहता है।
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उसकी बीमारी से उसके हाथ गूंगे हो गए।
बूढ़े साजिंदे के सब जज़्बात गूंगे हो गए।।
मेरी बर्बादी का मंजर इस कदर था खौफनाक।
वक्त की तारीख़ के लम्हात गूंगे हो गए।।
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मौजूदा दौर में अखिलराज जैसे शायरों की समाज को सख्त जरूरत है, जो सिस्टम को आइना दिखा सकें। अखिलराज को ग़ज़ल संग्रह ‘लावा’ के लिए बहुत-बहुत मुबारकबाद।
- दर्द गढ़वाली, देहरादून
09455485094



