परीक्षा से ज्यादा गुलदार और भालू के हमले की चिंता
परीक्षा केंद्र पर पहुंचने को करना पड़ता है 6 से 15 किलोमीटर तक सफर

देहरादून : उत्तराखंड में 12 फरवरी से वार्षिक परीक्षाओं की शुरुआत होनी है। इसी दौरान बोर्ड परीक्षाएं भी पहाड़ों में शुरू होने वाली हैं, लेकिन रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, पौड़ी गढ़वाल, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और चंपावत जैसे जिलों से जो तस्वीर सामने आ रही हैं, वह बेहद चिंताजनक हैं। कई गांवों में बच्चों को परीक्षा केंद्र तक पहुंचने के लिए 6 से 15 किलोमीटर तक का सफर तय करना पड़ता है। इसमें से अधिकतर रास्ते घने जंगलों, सुनसान पगडंडियों और ढलानों से होकर गुजरते हैं। यही वे इलाके हैं, जहां गुलदार और भालुओं की गतिविधियां सबसे अधिक दर्ज की जा रही हैं।
उत्तराखंड में वन्य जीवों का आतंक: पिछले कुछ महीनों में इन जनपदों में गुलदार द्वारा पालतू पशुओं का शिकार करने और रात के समय गांवों में घुसने और खेतों में काम कर रहे लोगों पर हमला करने की घटनाएं सामने आई हैं। भालू के अचानक आबादी वाले इलाकों में दिखने से भी दहशत का माहौल है। ऐसे हालात में जब बच्चों को तड़के घर से निकलकर स्कूल या परीक्षा केंद्र जाना पड़ता है, तो अभिभावकों की चिंता स्वाभाविक है। कई माता पिता अपने बच्चों को अकेले भेजने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। मजबूरी में उन्हें समूहों में या फिर किसी निजी वाहन में बैठाकर भेजा जा रहा है।
अभिभावक कर रहे हैं ये मांग: पहाड़ों में एक-एक वाहनों में कई-कई बच्चे जंगली जानवरों के डर से सफर करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर सुरक्षित और नजदीकी परीक्षा केंद्र होते, तो शायद बच्चों को इस तरह जान जोखिम में डालकर सफर न करना पड़ता। इसी चिंता के बीच अब अभिभावकों ने खुलकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
अभिभावकों ने शिक्षा विभाग को लिखा लेटर: बागेश्वर से लेकर पौड़ी गढ़वाल और पिथौरागढ़ तक कई अभिभावकों ने शिक्षा निदेशालय को पत्र भेजकर मांग की है कि पहाड़ी क्षेत्रों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए परीक्षाओं के समय केंद्रों की दूरी और सुरक्षा व्यवस्था पर दोबारा विचार किया जाए। उनका कहना है कि मैदानी इलाकों और पहाड़ों की भौगोलिक स्थिति एक जैसी नहीं है। ऐसे में एक ही तरह का परीक्षा कैलेंडर लागू करना बच्चों की सुरक्षा के साथ समझौता है।
बात अधिकारियों की और समस्या जनता की: स्थिति इसलिए भी गंभीर हो जाती है क्योंकि इसी दौरान 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं भी प्रस्तावित हैं। ये परीक्षाएं बच्चों के करियर की दिशा तय करती हैं, लेकिन पहाड़ के छात्रों के लिए इस दिशा तक पहुंचना ही सबसे कठिन चुनौती बनता जा रहा है। शिक्षकों के मुताबिक कई छात्र मानसिक दबाव में हैं। वे परीक्षा से पहले ही थकान और भय का सामना कर रहे हैं, जिसका असर उनके आत्मविश्वास और तैयारी पर भी पड़ रहा है। रुद्रप्रयाग जिले के उप वनाधिकारी अगस्त्यमुनि रेंज देवेंद्र सिंह पुंडीर की मानें तो क्षेत्र में हम लगातार गश्त बढ़ाने, पिंजरे लगाने और संवेदनशील इलाकों की पहचान कर रहे हैं। शुक्रवार को भी हमने एक गुलदार को पकड़ा है। स्कूली छात्रों की सुरक्षा के लिए भी स्कूलों और रास्तों में कर्मी लगाए गए हैं। इसके साथ ही कई जगह पर हम गाड़ियों में भी बच्चों को स्कूल तक छोड़ रहे हैं।
हौसले के बीच आंकड़े बेहद डरावने: वैसे देखा जाए तो उत्तराखंड में यह संकट नया नहीं है. हर साल राज्य में परेशानी अलग-अलग रूप में सामने आती हैं। कभी भारी बारिश, कभी बर्फबारी और अब गुलदार और भालुओं का आतंक। इसके बावजूद पहाड़ के बच्चों का हौसला कम नहीं हुआ है। डर के बीच भी वे किताबें लेकर निकल पड़ते हैं। इस उम्मीद के साथ कि शिक्षा ही उन्हें इन हालात से बाहर निकालने का रास्ता देगी, लेकिन ये बात भी सही है कि उत्तराखंड में जंगली जानवरों के द्वारा किये जा रहे हमलों के आंकड़े बेहद डरावने हैं। रोजाना कहीं ना कहीं लोगों को जंगली जानवर अपना शिकार बना रहे हैं।
भालू बन गए हमलावर: पिछले 25 वर्षों (2000-2025) के दौरान उत्तराखंड में भालुओं के हमलों में कुल 2,009 लोग घायल हुए हैं। 71 लोगों को जान गंवानी पड़ी। इसके अलावा 2025 में 12 लोगों की मौत और 88 घायल रिकॉर्ड किए गए हैं।
गुलदार भी ले रहे जान: गुलदार के हमले में जनवरी में ही 5 लोग मारे गए हैं। इनमें 2 लोगों की मौत गुलदार के हमले में नैनीताल और पौड़ी के गांवों में हुई है। एक मौत रुद्रप्रयाग जिले में हुई है।
वैसे तो परीक्षा कार्यक्रम पहले से तय होता है. लेकिन हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि बच्चों की शिक्षा पर इसका असर ना हो। हम लगातार अधिकारियों के साथ समन्वय बना कर काम कर रहे हैं। जरूरत जहां है, वहां खुद वन कर्मी स्कूल तक बच्चों को छोड़कर आ रहे हैं।
-डॉ धन सिंह रावत, शिक्षा मंत्री, उत्तराखंड-



