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कुमाऊंनी लोकगीतों का पर्याय हैं वीना तिवारी

सरकार की नज़र से दूर क्यों है फ़न में माहिर लोकगायिका वीना तिवारी, किसने किया उपेक्षित, क्यों नहीं मिलता अपेक्षित सम्मान

-रतनसिंह किरमोलिया

कुमाऊंनी गीत संगीत एवं गायकी की सुर साम्राज्ञी वीना तिवारी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वह कुमाऊंनी और गढ़वाली गीतों की उस जमाने की गायक कलाकार रही हैं जब आकाशवाणी लखनऊ से इनकी शुरुआत हो ही रही थी।यह करीब सन् 1963 के शुरुआती दिनों की बात है। इससे पूर्व कुमाऊंनी और गढ़वाली गीतों के प्रसारण की आकाशवाणी लखनऊ से कोई व्यवस्था नहीं थी। हां स्थानीय मेलों एवं कौतिकों में लोकगीत गाए एवं बजाए जाते थे। हालांकि उस समय कुमाऊंनी और गढ़वाली के कई गीतकार गीतों की रचना में लगे हुए थे। कुछ स्वयं गाते भी थे।

कुमाऊंनी और गढ़वाली लोकगीतों के हिमायती कुछ प्रबुद्ध विद्वानों ने आकाशवाणी लखनऊ से ‘ उत्तरायण कार्यक्रम ‘ नाम से इसकी शुरुआत की। इसकी जिम्मेदारी जयदेव शर्मा ‘ कमल ‘ और जीतसिंह जड़धारी को सौपी गई।  ये दोनों गढ़वाली में कार्यक्रम करते थे और कुछ कुमाऊंनी के गीत बजाया करते थे। कुमाऊंनी के लिए कंपीयर के रूप में बंशीधर पाठक ‘ जिज्ञासु ‘ को लाया गया।  7 जनवरी 1963 से वे उत्तरायण कार्यक्रम से जुड़ गए। तब कुमाऊंनी गढ़वाली गीतों को गाने वाले गायक कलाकारों को खोजा जाने लगा। कुमाऊंनी लोकगीत गाने के लिए वीना तिवारी का चयन किया गया। बाकायदा स्वर परीक्षा के बाद ‘ बी ‘ हाईग्रेड कलाकार के रूप में उनका चयन किया गया।  मैं समझता हूं लोक भाषा कुमाऊंनी के गीत गाने वाली तत्कालीन ‘बी’ हाईग्रेड कलाकार के रूप में वह प्रथम महिला गायिका रही हैं। उन्होंने कुमाऊंनी के साथ साथ गढ़वाली के भी कई लोकगीत गाए हैं। आकाशवाणी लखनऊ के ‘ उत्तरायण कार्यक्रम ‘ में उनकेे गाए गीतों के प्रसारण के बाद श्रोताओं से उन्हें जो प्यार और वाहवाही मिली वह काबिले तारीफ रही।

      वीना तिवारी का जन्म पिता कृष्णचंद्र और माता मोहिनी देवी के घर 14 जनवरी 1949 को लखनऊ में हुआ।उनका मूल पैतृक गांव ज्योली ( अल्मोड़ा) है। उनकी शिक्षा दीक्षा लखनऊ में ही हुई। उन्होंने बी ए  संगीत निपुण तक की शिक्षा भातखंडे संगीत महाविद्यालय लखनऊ से प्राप्त की। उनके संगीत एवं गायन में महारत हासिल करने में गोविंद नारायण नाटू और कृष्णराय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही । बाद में कुछ समय  के लिए बेगम अख्तर और बिरजू महाराज के सानिध्य में रह कर भी उन्हें संगीत एवं गायन सीखने का अवसर मिला।

      उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ से जुड़कर कुमाऊंनी गढ़वाली गीतों के अलावा हिंदी के गीत गजल एवं भजन भी गाए। आकाशवाणी लखनऊ के अलावा आकाशवाणी रामपुर नजीबाबाद और अल्मोड़ा केंद्रों से भी उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है।

       प्रतिष्ठित गीतकारों में चारुचंद्र पांडेय, शेरसिंह बिष्ट ‘ अनपढ़ ‘ , गोपालदत्त भट्ट, हीरासिंह राणा, बृजेंद्र लाल साह, बंशीधर पाठक ‘ जिज्ञासु ‘ , चंद्रसिंह राही, केशव अनुरागी,गिरीश तिवारी ‘ गिर्दा ‘ आदि के गीतों का अपने सुरीले कंठ एवं मोहक स्वर में गाकर स्वय भी लोकप्रियता हासिल की और गीतकारों को भी अमर कर दिया।

       उस समय के इनके गाए गीत काफी चर्चित एवं लोकप्रिय रहे। उनमें जैसे- झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, ओ परुवा बौज्यू, दे देवा बाबा जी कन्या को दान, बाट लागी बर्यात चेली, पारा भीड़ा जाणियां बटौव रे, बुरूंशी का फूलों को कुमकुम मारो, गिरधारी तेरो अति चकान, लोरी गीत और रामी बौराणी जैसे अनेकों गीतों को आपने स्वर दिया। जो आज भी सराहे जाते हैं।

       आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित कई धारावाहिकों में भी आपने काम किया। बर्ष 2022 की गणतंत्र दिवस की बीटिंग रिट्रीट परेड हेतु ‘ झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी.!’ की धुन को चुना गया था।

        आपने 6 बर्षों तक मोतीलाल नेहरू कन्या इंटर कालेज लखनऊ में और 19 बर्षों तक दयावती मोदी अकादमी रामपुर उप्र में संगीत विषय का अध्यापन किया।

         देश की नामी गिरामी कई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर आपको करीब डेढ़ दर्जन पुरस्कारों/सम्मानों से नवाजा गया। परंतु आश्चर्य की बात है कि सरकारी स्तर पर अद्यतन आपको न संगीत नाट्य अकादमी ने याद किया, न उत्तराखंड संस्कृति विभाग ने और न उत्तराखंड भाषा संस्थान ने ही आपकी कोई सुध ली। संगीत एवं गायन के क्षेत्र में इनके अमूल्य योगदान का कहीं कोई मूल्यांकन नहीं हो पाया। यहां तक कि वयोवृद्ध कलाकारों को मिलने वाली पेंशन से भी इन्हें महरूम रहना पड़ रहा है। उनका कहना है कि कई बार आवेदन करने के बावजूद किसी ने भी संज्ञान नहीं लिया। इस संबंध में उनका आगे कहना है कि वर्तमान में ‘ अपनी-अपनी और अपनों की दौड़ ‘ में उम्र की इस दहलीज में किससे कहूं और क्या कहूं। अब तो मन खिन्न हो चुका है और अब तमन्ना भी नहीं रह गई है।

       ( इस लेख के माध्यम से मेरा उत्तराखंड संस्कृति विभाग से अनुरोध है कि कम से कम उन्हें जीवन निर्वाह के लिए पेंशन तो अनुमन्य करवा देवें। उनके द्वारा लोकगीत संगीत क्षेत्र में दिए गए करीब 50 बर्षों के अमूल्य योगदान का मूल्यांकन का उत्तराखंड सरकार को संज्ञान लेना चाहिए। )

 

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