शायरों ने अपने कलाम से लूटी महफ़िल
- इप्टा उत्तराखंड और अहल-ए-सुख़न देहरादून ने हिमालय दिवस पर लखनऊ से आए शायर ओमप्रकाश नदीम के सम्मान में सजाई महफ़िल, प्रसिद्ध उद्योगपति डॉ. एस फारुख ने की सदारत, निजामत का जिम्मा प्रसिद्ध शायर अफजल मंगलौरी ने उठाया

देहरादून: इप्टा उत्तराखंड और अहल-ए-सुख़न देहरादून की ओर से बुधवार को हिमालय दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित काव्य संध्या में शायरों ने अपने कलाम से समां बांध दिया। लखनऊ से आए नामचीन शायर ओमप्रकाश नदीम के सम्मान में आयोजित इस काव्य संध्या की सदारत प्रसिद्ध उद्योगपति डॉ. एस. फारुख ने की, जबकि निजामत बाक़माल शायर अफजल मंगलौरी ने की।
इंदर रोड स्थित तस्मिया अकादमी में आयोजित इस काव्य संध्या की शुरुआत राज्य आंदोलनकारी सतीश धौलाखंडी के जनगीत से हुई। इसके बाद शायरी का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले कार्यक्रम आयोजक और युवा शायर राजकुमार राज ने अपने शेर ‘पर्वत, पेड़, परिंदे, झरने, पास में दरिया, अपने लिए तो यही ठिकाना ठीक रहेगा’ से प्रकृति, संवेदना और इंसानी जुड़ाव की खूबसूरत तस्वीर की। इसके बाद रुड़की से आए प्रसिद्ध शायर ओमप्रकाश नूर ने शेर ‘बुलबुले काँच के नहीं होते, अपने पत्थर संभाल कर रखिए’ सुनाया, जिसे खूब दाद मिली।
परमवीर कौशिक ने अपने शेर ‘तेवर थे दुश्मनी के ज़ालिम की दोस्ती में। हम खा गए हैं धोखा कौशिक हंसी हंसी में।।’ से श्रोताओं की तालियां बटोरी। दर्द गढ़वाली के चार मिसरों ‘ दिमागी नक्सली हैं हम कोई बागी नहीं हैं हम, परिंदे हैं मगर पिंजरे के तो आदी नहीं हैं हम। तुम्हारे साथ हैं हम भी तुम्हारे दोस्त हैं हम भी, मगर इतना समझ लेना तमाशाई नहीं हैं हम।’ को भी श्रोताओं ने सराहा। लखनऊ से आए प्रसिद्ध शायर ओमप्रकाश नदीम को श्रोताओं ने तसल्ली से सुना। उनके इस शेर ‘हर किसी की हाँ में हाँ करता नहीं हूं , इसलिए मैं आदमी अच्छा नहीं हूँ’ पर पूरा सदन तालियों से गूंज उठा।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे अफजल मंगलौरी ने अपनी ग़ज़ल ‘कभी रूठ जाना कभी मान जाना वो नख़रे पे नखरे किए जा रहे हैं। बताओ करें क्या अब इस ज़िंदगी का कि मर-मर के हम तो जिएं जा रहे हैं।तग़ज्जुल कहां ताबे नज़्ज़ारा लाए ग़ज़ल बनके वो रूबरू आज आए। रदीफ़ों को शर्मिंदगी हो रही है चुराकर नज़र क़ाफ़िए जा रहे हैं।।’ से श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी। असलम खतौलवी ने भी अपने कलाम से खूब वाहवाही लूटी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध उद्योगपति डॉ. एस. फारुख ने काव्य संध्या को कामयाब बताया। डॉ. फारुख की फरमाइश पर शायर अफजल मंगलौरी ने मरहूम शायर शमीम जयपुरी का कलाम पढ़कर उन्हें खिराजे-अकीदत पेश की। इस मौके पर अरुण श्रीवास्तव, ज़ियाउद्दीन शेख, डॉक्टर आरज़ू, गणनाथ मनोड़ी, शांति प्रकाश जिज्ञासु, शिवचरण शर्मा ‘मुज़्तर’, अमन रतूड़ी, हरेंद्र माझा समेत कई लोग मौजूद थे। कार्यक्रम आयोजक और रंगकर्मी डॉ. वीके डोभाल ने अतिथियों का शुक्रिया अदा किया।


