मंशाराम ने बसाया था दून का कनाट प्लेस

देहरादून: क्या आपको पता है देहरादून का कनाट प्लेस किसने बसाया था। दरअसल वर्ष 1873 में दून के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट रॉस ने चकराता में एक सैनिक छावनी स्थापित करने की योजना बनाई। इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए सहारनपुर से चकराता तक एक नए मार्ग के निर्माण का कार्य आरंभ हुआ। उस समय देहरादून से चकराता जाने का कोई सीधा मार्ग नहीं था। देहरादून से यमुना तट पर स्थित प्रमुख व्यापारिक केंद्र रामपुर मंडी तक जाने वाली सड़क ही इस दिशा का मुख्य मार्ग थी। घंटाघर से निकलकर रामपुर मंडी की ओर जाने वाली यह सड़क लंबे समय तक “रामपुर मंडी रोड” के नाम से जानी जाती रही। बाद के वर्षों में जब इसी मार्ग का उपयोग चकराता आने-जाने के लिए व्यापक रूप से होने लगा, तब इसका नाम बदलकर चकराता रोड पड़ गया।

उस समय घंटाघर से कुछ आगे बढ़ते ही सड़क के दोनों ओर आम और लीची के विशाल बाग फैले हुए थे। वर्ष 1944 में देहरादून के प्रसिद्ध वित्तीय संस्थान मंसाराम एंड संस बैंक के स्वामी लाला मंसाराम ने इसी क्षेत्र में एक आधुनिक आवासीय एवं व्यावसायिक कॉलोनी बसाने की योजना बनाई। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले कलकत्ता के टैगोर परिवार से अपने पुत्र महावीर प्रसाद तथा पौत्रों के नाम पर लगभग 27 बीघा भूमि खरीदी। इसके बाद महंत ओम प्रकाश के पुत्र सुरेन्द्र प्रकाश से 32 बीघे से अधिक भूमि का अधिग्रहण किया। इस प्रकार लगभग 58 बीघा भूमि एकत्रित कर यहाँ एक सुनियोजित कॉलोनी का निर्माण प्रारंभ किया गया, जिसका नाम कनाड प्लेस रखा गया।
उस समय के मानकों के अनुसार यह कॉलोनी अत्यंत आधुनिक मानी जाती थी। यहाँ मनोरंजन के लिए हॉलीवुड और अमृत नाम के दो सिनेमाघर बनाए गए इसके अतिरिक्त 94 दुकानें, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की शाखा, 48 आवासीय फ्लैट, दो बड़े बंगले, आठ गैरेज तथा 49 गोदाम भी निर्मित किए गए। बैंक प्रबंधन की योजना सड़क के दूसरी ओर भी इसी प्रकार का व्यावसायिक परिसर विकसित करने की थी।
किन्तु उस समय देहरादून की आबादी सीमित थी और इतनी बड़ी व्यावसायिक योजना के लिए पर्याप्त खरीदार तथा किरायेदार उपलब्ध नहीं हो सके। परिणामस्वरूप अधिकांश दुकानें और भवन लंबे समय तक खाली पड़े रहे।
लोगों को आकर्षित करने के लिए मंसाराम एंड संस बैंक ने अनेक सुविधाएँ प्रदान कीं। इच्छुक लोगों को एक वर्ष तक बिना किराये के रहने की अनुमति दी गई। दुकानों के ऊपर बने फ्लैट आवंटित किए गए और यह छूट भी दी गई कि आवंटी अपनी आवश्यकता के अनुसार दुकान अथवा आवास के नक्शे और आंतरिक बनावट में परिवर्तन कर सकते हैं।
फिर भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली और बैंक आर्थिक संकट में फँस गया। अंततः 24 अप्रैल 1952 को यंग रोड निवासी नेपाल सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री कर्नल शमशेर बहादुर जंग राणा की महारानी गंभीर कुमारी को यह पूरी सिनेमा रोड स्थित कॉलोनी 14 लाख 15 हजार रुपये में बेच दी गई।
कुछ समय बाद महारानी ने यह संपत्ति सेठ बाल गोपाल दास को हस्तांतरित कर दी। लेकिन उन्हें भी पर्याप्त किरायेदार नहीं मिले, इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे अधिकांश फ्लैट और दुकानें उनके कब्जाधारियों तथा किरायेदारों को ही अपेक्षाकृत कम मूल्य पर बेच दीं। इसी अवधि में हॉलीवुड और अमृत सिनेमाघरों के नाम बदलकर क्रमशः नटराज और कैपरी रख दिए गए।
सड़क के दक्षिणी भाग में निर्मित व्यावसायिक परिसर भी लंबे समय तक खाली रहे। फलस्वरूप वर्ष 1953 में उस हिस्से की संपत्ति भारतीय जीवन बीमा निगम को 5 लाख 75 हजार रुपये में बेच दी गई।
समय के साथ यह पूरा क्षेत्र देहरादून के सबसे प्रमुख व्यावसायिक और आवासीय इलाकों में विकसित हो गया। आज चकराता रोड के आसपास यमुना कॉलोनी, दीपलोक कॉलोनी, विजय पार्क, आशीर्वाद एन्क्लेव और वसंत विहार जैसी घनी आबादी वाली बस्तियाँ बस चुकी हैं। इसी क्षेत्र में देश के प्रतिष्ठित शिक्षण एवं शोध संस्थान, जैसे फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट और दून स्कूल भी स्थित है।



