हिंदी के पाठकों को बचाने की जरूरत: जितेन ठाकुर
दून लाइब्रेरी में साहित्यकार डॉ. रजनी गुप्त के उपन्यास 'लोकापचारी' का हुआ लोकार्पण

देहरादून: दून पुस्तकालय में सोमवार को शहर की साहित्यिक- सांस्कृतिक संस्था ‘संवेदना’ द्वारा ‘समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां’ विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। वक्ताओं ने हिंदी के पाठकों की संख्या में कमी पर चिंता जताते हुए इन्हें बचाने पर जोर दिया। साहित्यकार डॉ. रजनी गुप्त के 11वें उपन्यास ‘लोकापचारी’ का लोकार्पण भी हुआ। साहित्यकार सरोजिनी नौटियाल ने पुस्तक की समीक्षा की।

मुख्य वक्ता के रूप में लखनऊ से आई सुप्रसिद्ध कथाकार उप संपादक ‘कथाक्रम’ डॉक्टर रजनी गुप्त ने कहा कि यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि हिंदी के गंभीर साहित्य के पाठकों की संख्या घट रही है। युवा पीढ़ी हिंदी साहित्य नहीं पढ़ना चाहती। रजनी गुप्त ने अपने वक्तव्य में इस बात पर बल दिया कि बाज़ारवाद की तमाम चुनौतियों से मुठभेड़ करते हुए लेखक को ऐसे विषय पर लेखनी चलानी चाहिए, जिससे युवा पीढ़ी अपना जुड़ाव महसूस करे। डॉ. उल्लेखनीय है कि रजनी गुप्त स्वयं युवा पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। उनके उपन्यासों/कहानियों के पात्र आज की युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। स्त्रियों की लैंगिक समानता की पक्षधरता में आप बराबर लिखती रही हैं। अपने वक्तव्य में भी उन्होंने स्त्रियों के प्रति पारंपरिक सामाजिक नज़रिए का प्रतिरोध व्यक्त किया।

उत्तराखंड सरकार द्वारा साहित्य भूषण सम्मान से विभूषित वरिष्ठ कथाकार डॉक्टर जितेन ठाकुर ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि लेखन तभी सफल होता है, जब पाठक उससे जुड़ाव महसूस करता है। हिंदी के पाठक काफ़ी घट गए हैं, जो शेष हैं उन्हें बचाए जाने की आवश्यकता है। पाठकों की घटती संख्या के लिए केवल लेखक जिम्मेदार नहीं है इसके पीछे बहुत से कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है बच्चों की अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा। सोशल मीडिया, ओटीटी और टेलीविजन भी प्रिंट मीडिया के लिए अवरोध का कार्य करता है। इन सभी चुनौतियों के प्रतिकार के लिए हिंदी के सभी लेखकों को मंथन करना चाहिए।
दर्शक दीर्घा में उपस्थित विद्वानों ने प्रश्नोत्तर काल में वक्ताओं से प्रश्न भी पूछे। इस रूप में उनकी सक्रिय सहभागिता रही। निकोलस ने खूबसूरत पोस्टर बनाया तथा डॉक्टर चंद्रशेखर तिवारी ने आयोजन में सहयोग दिया। संयोजक का दायित्व समदर्शी बर्थवाल जी ने निभाया। इस मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉली डबराल, राजेश पाल, सुधा जुगरान, शशिभूषण बडोनी, शिवमोहन सिंह, रजनीश त्रिवेदी, यामा शर्मा, निशा अतुल्य, कुसुम भट्ट, कल्पना बहुगुणा, मंजू काला, कांता घिल्डियाल, दर्द गढ़वाली आदि मौजूद थे।



