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डेढ़ दिन की धमाचौकड़ी के बाद पसरा सन्नाटा, फिर अंधेरे में डूबा गैरसैंण

देहरादून: डेढ़ दिन की धमाचौकड़ी के बाद गैरसैंण का विधानसभा भवन फिर अंधेरे में डूब गया और इसके साथ ही क्षेत्रवासियों की उम्मीद का दीपक भी बुझ गया। हर बार की तरह इस बार भी उत्तराखंड की जनभावनाओं से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल पीछे छूट गया कि आखिर इस ‘डेढ़ दिन’ के सत्र से गैरसैंण को क्या मिला? क्षेत्रीय जनता टकटकी लगाए बैठी थी कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार गैरसैंण की तकदीर बदलने वाली कोई ऐतिहासिक घोषणा करेगी।

विशेषकर गैरसैंण को नया जिला बनाए जाने की चर्चाओं से स्थानीय लोग बेहद उत्साहित थे, लेकिन जनभावनाओं पर तब कुठाराघात हो गया, जब बिना प्रश्नकाल के ही सत्र को आनन-फानन में अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इस दौरान न तो विधायक अपने क्षेत्रों की बुनियादी समस्याएं सदन में उठा पाए और न ही सरकार ने गैरसैंण के लिए कोई बड़ी राहत दी। हाथ लगी तो सिर्फ और सिर्फ मायूसी।

राज्य आंदोलनकारियों का आरोप है कि नेताओं और नौकरशाहों के खाने-पीने, ठहरने और आलीशान गाड़ियों के ईंधन पर काफी धन खर्च किया गया। माननीयों और अफसरों के वीआईपी कमरों में हीटर से लेकर तमाम ऐशो-आराम की सुविधाएं मौजूद थीं, वहीं दूसरी ओर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में कानून-व्यवस्था संभालने पहुंचे सुरक्षा बल के जवानों को कड़कड़ाती ठंड के बीच भारी दिक्कतों और अव्यवस्थाओं से दो-चार होना पड़ा।

 स्थायी राजधानी संयुक्त संघर्ष समिति के अध्यक्ष नारायण सिंह बिष्ट ने आरोप लगाया कि सरकार को गैरसैंण और पहाड़ के सरोकारों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। अगर सरकार गैरसैंण की इतनी ही हितैषी है, तो इसे पूर्ण स्थायी राजधानी क्यों नहीं घोषित करती? इस समय तो सरकार के पास पूरा मौका और बहुमत था, लेकिन केवल जनता को ठगने और करोड़ों के सरकारी बजट को ठिकाने लगाने का काम किया गया है।

 

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