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यूपी पुलिस को भंग ही कर देना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट 

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और मनमानी पर देश की सर्वोच्च अदालत ने अब तक की सबसे तीखी और तल्ख टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यूपी पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जिस तरह से यहां कानूनी प्रक्रियाओं का माखौल उड़ाया जा रहा है, उसे देखते हुए तो “यूपी पुलिस को भंग ही कर देना चाहिए।” कोर्ट ने दो टूक शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि व्यवस्था और कानून के साथ चल रहा यह खिलवाड़ और बकवास अब हर हाल में बंद होना चाहिए। कोर्ट ने ये टिप्पणी एक FIR में आरोपी का नाम खाली छोड़ देने और बाद में नाम जोड़ने पर की है। दूसरी तरफ कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि इस सरकार का रवैया पहले दिन से ही भेदभावपूर्ण रहा है‌

किस मामले पर भड़का सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा?

मामला उस जांच से जुड़ा है जिसमें पुलिस ने एक मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ ‘अज्ञात’ व्यक्ति के नाम से एफआईआर दर्ज की, जबकि शिकायतकर्ता का कहना था कि उसने आरोपी को मौके पर ही पकड़ लिया था और पुलिस के हवाले कर दिया था। पीठ ने सवाल किया कि एफआईआर अज्ञात लोगों के खिलाफ क्यों दर्ज की गई? अगर व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था तो उसका नाम अज्ञात क्यों लिखा गया? अगर उसे मौके पर पकड़ा गया था तो अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज की गई? लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे? याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस ने शुरुआत से ही जांच को एकतरफा तरीके से आगे बढ़ाया। उसका कहना था कि मौके पर पकड़े गए मोटरसाइकिल सवार का नाम एफआईआर में दर्ज नहीं किया गया और आरोपी वाले कॉलम को खाली छोड़ दिया गया।

बाद में हाईकोर्ट के स्टेटस रिपोर्ट मांगे जाने के बाद पुलिस ने चार्जशीट में मोटरसाइकिल सवार का नाम शामिल किया, लेकिन बाद में उसे क्लीन चिट दे दी गई।  याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि जब मोटरसाइकिल जब्त की गई थी तब उस पर नंबर प्लेट नहीं थी, लेकिन जांच के दौरान बाद में उसमें एक रजिस्ट्रेशन नंबर जोड़ दिया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि लाइन पर चलना एक बात है, लेकिन उसके लिए हद से ज्यादा झुक जाना दूसरी बात है और इस तरह का कवर-अप? जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है।

पीठ ने यह भी सवाल किया कि आप आरोपी को मौके पर पकड़ते हैं, लेकिन एफआईआर में उसका नाम नहीं देना चाहते। शायद अगर समीकरण आपके पक्ष में बन जाए तो आप नाम बदल सकते हैं, अपने किसी व्यक्ति का नाम डाल सकते हैं… क्या वहां इसी तरह काम होता है? कोर्ट ने यूपी पुलिस की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे को भी “पूरी तरह निराशाजनक” बताया।

 कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा कि अधिकारी को बेहतर हलफनामे के साथ आना होगा और यह साफ करना होगा कि जब मोटरसाइकिल सवार को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो एफआईआर में उसका नाम क्यों नहीं दर्ज किया गया।

कोर्ट की चेतावनी: अपनी हद में रहे पुलिस

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और पुलिस के आला अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई भी पुलिस अधिकारी कानून और संविधान से ऊपर नहीं है। अगर पुलिस ने अपनी इस मनमानी कार्यशैली को तुरंत नहीं सुधारा, तो अदालत को सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश शासन की होगी।

 

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