केंद्रीय चुनाव आयोग में रार, दो आयुक्तों की आपत्ति से एसआईआर विवाद गहराया
फॉर्म-6 में बदलाव को अवैध बताया गया, डेटाबेस केंद्रीकरण और आईटी सिस्टम पर सवाल, आयोग की सफाई और राजनीतिक बवाल
नई दिल्ली: द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की खबर ने चुनाव आयोग के अंदर गहरी दरार का खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए फैसलों पर रिकॉर्ड में 14 बार आपत्ति दर्ज कराई। ये आपत्तियां विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर ) प्रक्रिया, नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़ी हैं। रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने तीखा हमला बोला है, जबकि आयोग का कहना है कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दोनों आयुक्तों ने लिखित रूप से कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन में दर्ज हुईं। उनका आरोप है कि कई आदेश और फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना आयोग के नाम पर जारी किए गए। ये आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त को भी भेजी गईं। 9 सितंबर को चार महीने बाद तीनों आयुक्तों की पूरी बैठक हुई। दोनों आयुक्तों ने जुलाई में कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को भी पत्र लिखकर आईटी विभाग के कामकाज में बदलाव की शिकायत की।
आपत्तियां मुख्य रूप से चार क्षेत्रों से जुड़ी हैं। पहला, नए मतदाताओं का पंजीकरण और फॉर्म-6 में बदलाव। दूसरा, मतदाता सूची से नाम हटाना, जोड़ना और बहाल करना। तीसरा, पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान दाखिल की गई अपीलें। चौथा, मतदाता डेटाबेस और सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण। रिपोर्ट में कहा गया है कि SIR प्रक्रिया के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए। गोवा में सॉफ्टवेयर की वजह से 97 पात्र मतदाताओं का नाम नहीं जुड़ सका, जबकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश था। पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख अपीलों को लेकर संधू ने पूछा कि ये अपीलें आयोग की ओर से कौन और किसके आदेश पर दाखिल कर रहा है।
सबसे बड़ा विवाद फॉर्म-6 को लेकर है, जिससे नए मतदाता पंजीकरण कराते हैं। मई 2026 में विवेक जोशी ने फाइल पर लिखा कि फॉर्म-6 वैधानिक फॉर्म है और इसे बदलने के लिए सरकार को नियम संशोधित करने होंगे। सुखबीर सिंह संधू ने भी सहमति जताई। इसके बावजूद पोर्टल पर बदलाव कर दिया गया, जिसमें नए मतदाताओं से पूछा जाने लगा कि वे या उनके माता-पिता/दादा-दादी पिछली SIR सूची में हैं या नहीं। 13 अगस्त को संधू ने इसे “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए तुरंत हटाने की मांग की। उन्होंने लिखा कि इससे युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं को परेशानी हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार यह बदलाव अब तक नहीं हटाया गया।
दोनों आयुक्तों ने चेतावनी दी कि मतदाता सूची का डेटाबेस धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रित किया जा रहा है। ईसीआईनेट और ईआरओनेट सिस्टम पर जमीनी स्तर के अधिकारियों (ईआरओ, डीईओ, सीईओ) की पहुंच सीमित कर दी गई। विवेक जोशी ने मई में आईआईटी विशेषज्ञों से ऑडिट कराने का प्रस्ताव दिया ताकि यह सुनिश्चित हो कि केवल वैधानिक अधिकारी ही डेटाबेस में बदलाव कर सकें। जुलाई में आईटी विभाग की निगरानी का काम एक अधिकारी से हटाए जाने पर दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा और आदेश को रद्द कर दिया। संधू का कहना था कि राज्य स्तर के अधिकारियों के पास पूरा एक्सेस नहीं है और आईटी प्रमुख को इसे रोकने का कानूनी अधिकार नहीं है।
चुनाव आयोग के सूत्रों ने रिपोर्ट का खंडन करते हुए कहा कि दोनों आयुक्तों ने कुछ व्यावहारिक सुझाव और टिप्पणियां दी थीं, लेकिन अंतिम फैसले तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति और हस्ताक्षर से लिए गए। आयोग का दावा है कि व्यक्तिगत राय को संस्थागत असहमति नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर विपक्ष ने तीखा हमला बोला। कांग्रेस ने कहा कि तीन सदस्यीय आयोग में सिर्फ ज्ञानेश कुमार की चल रही है। मनीष तिवारी ने “अदृश्य हाथ” का आरोप लगाया। टीएमसी, समाजवादी पार्टी, सीपीआई(एम) और शिवसेना (यूबीटी) ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे या महाभियोग की मांग की। कुछ नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। मामला अभी भी गर्माया हुआ है और आगे की कानूनी-राजनीतिक कार्रवाई पर नजर है।



