उत्तराखंड में विकास की राजनीति गायब, दुष्कर्म के आरोपों से घिरे सत्ता और विपक्ष के नेता
देवभूमि में बेटियों की सुरक्षा पर सियासत गर्म, 2027 के चुनाव से पहले नेताओं की नैतिकता पर सवाल
-लक्ष्मी प्रसाद बडोनी
देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड में विकास की राजनीति आखिर कहां गुम हो गई? जिस प्रदेश की पहचान कभी शांत पहाड़ों, संस्कृति, पर्यटन और आध्यात्मिकता से होती थी, आज वहां महिला सुरक्षा, दुष्कर्म के आरोप, राजनीतिक संरक्षण और नेताओं की जवाबदेही जैसे सवाल सुर्खियों में हैं। जनता को रोजगार, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर जवाब चाहिए, लेकिन राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर आ रहे हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में 23 साल पुराना जेनी प्रकरण एक बार फिर भूचाल लेकर आया है। असम निवासी जेनी उर्फ इंदिरा देवी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत पर गंभीर आरोप लगाते हुए दोबारा सीबीआई जांच और डीएनए टेस्ट की मांग की है। जेनी का आरोप है कि वर्ष 2002-03 में जब वह महज 16 वर्ष की थीं, तब उनके साथ दुष्कर्म हुआ और बाद में उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया।
जेनी ने आरोप लगाया है कि पिछली जांच में उनकी बात सही तरीके से नहीं सुनी गई। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से न्याय की गुहार लगाई है। दूसरी ओर हरक सिंह रावत ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पूर्व में सीबीआई जांच और डीएनए परीक्षण के बाद उन्हें क्लीन चिट मिल चुकी है। उन्होंने इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए मानहानि की कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। फिलहाल जेनी की नई शिकायत की जांच देहरादून पुलिस कर रही है।
अंकिता हत्याकांड से जेनी प्रकरण तक, आखिर कब जागेगी राजनीति?
उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड ने भी पूरे देश में आक्रोश पैदा किया था। उस मामले में भी वीआईपी की भूमिका, प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही और निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब जेनी प्रकरण ने एक बार फिर राजनीतिक दलों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
सवाल सिर्फ कांग्रेस या भाजपा का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक व्यवस्था का है, जिसमें महिला सुरक्षा का मुद्दा तभी गरमाता है जब किसी नेता पर आरोप लगते हैं या चुनाव नजदीक आते हैं।
जनता पूछ रही है पांच बड़े सवाल
क्या उत्तराखंड में महिला सुरक्षा केवल चुनावी घोषणापत्र और भाषणों तक सीमित रह गई है?
क्या किसी भी दल का नेता आरोपों से परे है?
महिला अपराधों के मामलों में निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की गारंटी कौन देगा?
क्या विपक्ष केवल राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दे उठाएगा या अपनी पार्टी के नेताओं से भी जवाब मांगेगा?
आखिर पहाड़ की बेटियों को सुरक्षित माहौल देने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
देवभूमि को राजनीतिक तमाशा नहीं, जवाबदेह सरकार चाहिए
उत्तराखंड की जनता को अब खोखले नारों और राजनीतिक ड्रामे से आगे बढ़कर जवाब चाहिए। प्रदेश में पलायन जारी है, युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में भटक रहे हैं, पहाड़ों में स्वास्थ्य सुविधाएं कमजोर हैं और शिक्षा व्यवस्था चुनौतियों से जूझ रही है। इन मुद्दों पर ठोस काम करने के बजाय यदि राजनीति आरोपों और प्रत्यारोपों में उलझी रहेगी तो विकास की बात महज पोस्टरों तक सिमटकर रह जाएगी।
सवाल कड़वा है, लेकिन जरूरी है—क्या उत्तराखंड में विकास की राजनीति दम तोड़ चुकी है और महिला सुरक्षा भी राजनीतिक हथियार बनकर रह गई है?
देवभूमि की जनता को न भाजपा का राजनीतिक तमाशा चाहिए, न कांग्रेस की चुप्पी। जनता को चाहिए पारदर्शी जांच, दोषियों को सजा, पीड़िताओं को न्याय और महिलाओं के लिए सुरक्षित उत्तराखंड।
क्योंकि देवभूमि की पहचान नेताओं के बयानों से नहीं, यहां की बेटियों की सुरक्षा और सम्मान से होनी चाहिए।



