पहले दिन भक्तों ने की देवी के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा
घट स्थापना के साथ ही उत्तराखंड में शारदीय नवरात्र शुरू, माता रानी के मंदिरों को फूलों और रंग-बिरंगी झालरों से भव्य रूप से सजाया गया

देहरादून: हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है। यह पावन पर्व मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा और आराधना को समर्पित है। नवरात्रि के पहले दिन घरों और मंदिरों में कलश स्थापना यानी घटस्थापना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से कलश स्थापना करने और मां दुर्गा की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नवरात्रि के दौरान भक्त नौ दिनों तक व्रत रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और मां दुर्गा से सुख, शांति और खुशहाली की कामना करते हैं।

इधर, शारदीय नवरात्र की शुरुआत के साथ ही भक्तों में गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है।नवरात्र के नौ दिनों तक देवभूमि उत्तराखंड के तमाम मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की उम्मीद है। आज घटस्थापना के साथ ही मंदिरों में सुबह से ही भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया। इस खास मौके के लिए माता रानी के मंदिरों को फूलों और रंग-बिरंगी झालरों से भव्य रूप से सजाया गया है। घरों और मंदिरों में माता के दरबार सजकर तैयार हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मुख्यमंत्री आवास में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। मुख्यमंत्री ने समस्त प्रदेशवासियों को शारदीय नवरात्रि की शुभकामनाएं देते हुए सभी के सुख, शांति, समृद्धि एवं उत्तम स्वास्थ्य की कामना की।
देवी के दर्शन और मंगला आरती में शामिल होने के लिए भक्त तड़के से ही मंदिरों में पहुंचने लगे।देहरादून के सिद्धपीठ मां डाट काली मंदिर में सुबह से ही दर्शनों के लिए लंबी कतारें लगी रहीं। भक्त लाइन में लगकर बारी का इंतजार करते दिखे। मंदिर में सुबह की आरती के बाद हवन हुआ और कीर्तन मंडलियों ने माता के भजन गाए।महंत शुभम गोस्वामी ने बताया कि नवरात्र पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आ रहे हैं, साथ ही कई लोग नए वाहनों की पूजा के लिए भी मंदिर पहुंच रहे हैं।
कोटद्वार में नवरात्र पर फलाहारी बाबा मंदिर स्थित नवदुर्गा मंदिर, सिद्धबली मंदिर, संतोषी माता मंदिर और सुखरो देवी मंदिर सहित विभिन्न मंदिरों में सुबह से ही पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो गया। आचार्य देवी प्रसाद भट्ट ने बताया कि हिमालय में जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप को शैलपुत्री कहा जाता है। इसके अलावा, राजधानी देहरादून में भी विभिन्न मंदिरों में देवी के पहले स्वरूप की विधि-विधान से पूजा की गई।



